कोरोना वायरस को लेकर पिछले कुछ महीनों से पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ है। ईरान से लेकर इटली और इंग्लैंड से लेकर अमेरिका तक, हर जगह की आबादी इसकी जद में है। जाहिर है कोरोना भारत भी पहुँचा और अब केंद्र सरकार कह रही है कि यह बीमारी देश में स्टेज-2 से स्टेज-3 के बीच है यानी अब कम्युनिटी ट्रांसफ़र तक भी पहुँच सकती है। पूरी दुनिया की तरह कोरोना ने भारत में भी जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। ये वायरस चीन के वुहान शहर से फैला, मगर कैसे, इस पर अभी विशेषज्ञ कुछ भी साफ-साफ कहने की स्थिति में नहीं हैं। चूँकि इस वायरस से दुनिया पहली दफ़ा वाबस्ता हुई है, सो अभी तक इसकी कोई अचूक दवा नहीं बन पाई है।

लेकिन इस सब के बीच इस वायरस को लेकर भारत में अलग तरह की परेशानियाँ सामने आ रही हैं, जो अमूमन मज़हबी हैं. दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज़ से तब्लीग जमात के जमावड़े के बाद बड़ी संख्या में जमाती इस वायरस की चपेट में हैं और भारतीय मीडिया का एक वर्ग इसे हिन्दू-मुसलमान का रंग देने में लगा हुआ है। पर मैं यहाँ दूसरी बात करना चाहती हूँ। मैं देख रही हूँ कि मुस्लिम समुदाय के एक धड़े में भी इस वायरस यानी कोरोना को लेकर कई भ्रांतियाँ घर कर गई हैं। केंद्र सरकार और मुख़्तलिफ़ राज्य सरकारें इस बीमारी पर काबू पाने के लिए अपने स्तर से कदम तो उठा रही हैं, पर जनता में इस बीमारी को लेकर अभी जागरुकता की कमी है। कुछ मुसलमानों के दिमाग में ये भ्रम है कि उन्हें ये बीमारी नहीं हो सकती।

ऐसा नही कि सिर्फ मुस्लिमो मे ही ऐसा अंधविश्वास हो, कुछ जगहो पर हिन्दू समाज मे भी ऐसी बाते सामने आई हैं, जिन मे गौ मूत्र के सेवन से कोरोना खत्म किया जा सकता है. उत्तराखन्ड के बी जे पी एम एल ए ने दावा किया “हमारी हिन्दू संस्कृति विश्व की महान संस्कृति है। हवन-पूजन में जिस सामग्री का उपयोग होता वह वातावरण से हानिकारक तत्वों को चुटकियों में नष्ट करने की ताकत रखती है। इसी प्रकार गोमूत्र सेवन और प्रभावित स्थान पर गोबर के प्रयोग से भी कोराना वायरस को खत्म किया जा सकता है।”  दिल्ली में कोरोना खत्म करने के लिए गौ मूत्र पार्टी का आयोजन भी किया गया था।

मुझे लगता है कि इसके दो कारण हैं। एक तो सरकारों की तरफ़ से इस बारे में ज़मीन पर जागरुकता कार्यक्रम ज़्यादा नहीं चलाए गए, दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ और ग़लत दावे वाले वीडियो वायरल हैं । इसमें टिकटाक, यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सअप का बड़ा रोल है। मशहूर वीडियो एप्प टिकटॉक  पर तो ऐसे बहुत सारे वीडियो सामने आए हैं जिनमें नौजवान ये संदेश देते हुए दिख रहे हैं कि मुसलमानों को कोरोना हो ही नहीं सकता। चूँकि टिकटॉक की पहुँच आज गाँवों तक है, सो भारत की एक बड़ी अशिक्षित मुस्लिम आबादी इसके प्रभाव में है। लोग ये मानने को तैयार ही नहीं कि अगर वे अल्लाह की इबादत कर रहे हैं तो उन्हें कोरोना छू भी पाएगा।

मैं अभी अमरोहा के एक छोटे से कस्बे से हूँ और यहाँ जब मैंने अपने आसपास की मुस्लिम आबादी से बात की, तो उनका यही कहना था कि मुसलमानों को कोरोना नहीं हो सकता? क्यों नहीं हो सकता, इस बारे में उनके अपने तर्क हैं। वे इबादत से कोरोना को भगा देना चाहते हैं। उनकी बातों से लगा कि कोरोना पहले धर्म पूछेगा, उसके बाद किसी इंसान को अपनी गिरफ़्त में लेगा। ये लोग मेरे पड़ोसी हैं पर ये एक अलग ही दुनिया में जी रहे हैं। आप रोज़ ख़बर देख रहे हैं कि क्या राजा और क्या रंक, क्या हिंदू और क्या मुसलमान, सब इसकी चपेट में आ रहे हैं पर ये लोग इसे मानने को तैयार नहीं।

भारत में अब तक कोरोना के 17000 से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं। 500 से ज़्यादा लोग इसकी वजह से मर चुके हैं। पूरी दुनिया में हजारों मुसलमानों को कोरोना का संक्रमण हुआ है। भारत में ही तबलीगी जमात के लोग बड़ी तादाद में इससे संक्रमित पाए जा रहे हैं। तो क्या ये मुसलमान नहीं है ? जमाती तो पाँच वक़्त की नमाज़ के पाबंद होते हैं, क़ुरआन पढ़ते हैं, फिर इनको कोरोना का संक्रमण कैसे हुआ ? कोई भी तर्कशील व्यक्ति ये सब सोचेगा, समझेगा, पर ऐसा नहीं हो पा रहा।

कोरोना का संक्रमण दुनिया में कितनी तेज़ी से फैला और इसे लेकर एहतियातन क्या कदम उठाए जा रहे हैं, ये इसी बात से समझा जा सकता है कि इस्लाम के सबसे पवित्र धार्मिक स्थल सऊदी अरब के मक्का में फ़िलहाल सालो भर होने वाले तवाफ नामक धार्मिक क़वायद पर रोक लगा दी गई है। ये तब है, जब वर्ष 1918 में फ्लू जैसी विश्वव्यापी महामारी के दौरान भी हज को नहीं रोका गया था। उस वक़्त फ़्लू से दुनियाभर में तकरीबन 10 लाख लोग मरे थे। अब कोरोना का संकट है। सऊदी अरब समेत दुनिया के कई मुस्लिम बहुल आबादी वाले मुल्कों जैसे ईरान, तुर्की, यूएई, लेबनान, इराक, जॉर्डन आदि में मस्जिदों में या तो नमाज़ बंद कर दी गई है या फिर कम तादाद में नमाज़ियों को इकट्ठा होने को कहा गया है। सो भारत में भी मुसलमानों को इस बात का इल्म रखना चाहिए कि इस तरह की पाबंदियां उनकी ही जान की हिफाज़त के लिए लगायी हैं। इसलिए हमारा फ़र्ज़ है कि हम सरकार द्वारा फ़ौरी तौर पर लगाई गई इन पाबंदियों पर अमल करें और ख़ुद के साथ-साथ दूसरों की भी हिफ़ाज़त करें। सोशल डिस्टेंसिंग यानी समाज में एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने की बात इसीलिए की जा रही है।

ये देश हम सब का है और कोरोना से जंग में देश के हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई यानी हर मज़हब के लोगों को साथ आना होगा। धर्म की राजनीति हम बाद में कर लेंगे पर पहले खुद को इस बीमारी से बचाना होगा। सरकार को भी लॉकडाउन के अलावा अलग-अलग माध्यमों से देश के गांव-गांव तक कोरोना के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ाने की क़वायद तेज़ करनी चाहिए ताकि सोशल मीडिया के फेक न्यूज़ और ग़लत संदेश वाले वीडियो गरीब, अशिक्षित और भोली-भाली जनता को गुमराह ना कर सके। मुसलमानों को भी ये समझना होगा कि अल्लाह उसी की हिफ़ाज़त करता है, जो अपनी हिफ़ाज़त पहले ख़ुद करता है।

शबनाज़ खानम

लेखिका आईआईएमसी, दिल्ली, में उर्दू पत्रकारिता पाठ्यक्रम की छात्रा हैं

डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए द आउटरीच8 उत्तरदायी नहीं है।

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