नई दिल्ली: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बुधवार को स्पष्ट किया कि कोरोना वायरस के नए डबल म्यूटेंट वेरिएंट को सीधे बढ़ते संक्रमण की संख्या नहीं जोड़ा जा सकता है. कोरोना मामलों में इस वृद्धि के लिए किसी भी विशेष क्षेत्र के अतिसंवेदनशील आबादी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो कोविड-19 के उपयुक्त मानदंडों का पालन नहीं कर रहे हैं. नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के निदेशक डॉ. सुजीत कुमार ने कहा कि इस तरह की आबादी किसी भी स्ट्रेन की चपेट में आ सकती है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बुधवार को ‘जीनोम सीक्वेन्सिंग वर्क’ पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसे भारतीय SARS-CoV-2 कंसोर्टियम ऑन जीनोमिक्स ने पिछले कुछ महीनों में किया था. इस दौरान कहा गया कि राज्यों और केद्र शासित प्रदेशों द्वारा शेयर किए गए कुल 10,787 पॉजिटिव मामलों में 771 वेरिएंट्स का पता चला है। इनमें यूके, दक्षिण अफ्रीकी और ब्राजील के वेरिएंट शामिल थे.
इन तीन म्यूटेंट के अलावा, केंद्र ने एक डबल म्यूटेंट वेरिएंट का भी उल्लेख किया, जो नया है। साथ ही यह भी कहा कि इस तरह के म्यूटेशन से इम्यूनिटी कमजोर होती है और संक्रामण फैलने की संभावना बढ़ जाती है.
क्या है भारत मेें मिला डबल म्यूटेंट वैरिएंट ?
देश में मिले डबल म्यूटेंट वैरिएंट को लेकर अभी शुरुआती जानकारी ही सामने आई है. भारत में पहली बार डबल म्यूटेंट वैरिएंट का पता चला है. डबल म्यूटेंट वैरिएंट को लेकर एक जानकारी ये सामने आई है कि कोरोना का ये प्रकार तेजी से फैलता है यानि ये ज्यादा संक्रामक है. साथ ही यह शरीर के इम्यून सिस्टम यानी प्रतिरक्षा तंत्र से बचने में भी सक्षम है. यह नया ‘डबल म्यूटेंट’ वैरिएंट शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचकर बॉडी में संक्रामकता के स्तर को बढ़ाता है. हालांकि अभी इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि देश में बढ़ रहा संक्रमण, कोरोना के इस नए वैरिएंट की वजह से ही है.
‘डबल म्‍यूटंट’ कौन सा वैरिएंट है? क्‍या खतरा है?
आसान भाषा में कहें तो ‘डबल म्‍यूटेशन’ तब होता है जब वायरस के दो म्‍यूटेटेड स्‍ट्रेन्‍स मिलकर एक तीसरा स्‍ट्रेन बनाते हैं।
भारत में जो ‘डबल म्‍यूटंट’ वैरिएंट है वो E484Q और L452R म्‍यूटेशंस का कॉम्बिनेशन है। E484Q और L452R को अलग से वायरस को और संक्रामक व कुछ हद तक वैक्‍सीन से इम्‍युन पाया गया है.
वायरस में बदलाव आते रहते हैं मगर अधिकतर की वजह से ज्‍यादा परेशानी नहीं होती. लेकिन कुछ म्‍यूटेशंस के चलते वायरस ज्‍यादा संक्रामक या घातक हो सकता है.
डबल म्‍यूटेशन की वजह से वायरस के भीतर इम्‍युन रेस्‍पांस से बचने की क्षमता आ जाती है यानी ऐंटीबॉडीज उसका कुछ नहीं बिगाड़ पातीं.
एक बड़ा रिस्‍क ये है कि पहले से बने टीकों का वैरिएंट पर असर होगा या नहीं, यह नहीं पता होता.

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